- अनुसूचित जनजाति कार्य विभाग का बड़ा कारनामा, फर्जी दस्तावेज से टेंडर घोटाला उजागर…
- टेंडर में बड़ा झोल: गलत दस्तावेजों के सहारे ठेकेदारों ने लगाई सेंध, जांच शुरू…
छिंदवाड़ा : जिले के अनुसूचित जनजाति एवं जाति विभाग में टेंडरों को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। विभाग ने निर्माण कार्य और छात्रावासों की मरम्मत के लिए जारी निविदाओं में उस ठेकेदार को पात्र घोषित कर दिया जिसने दस्तावेजों में गलत जानकारी दी थी। हैरान करने वाली बात यह है कि दो अलग-अलग ठेकेदारों द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों में एक ही महिला का इलेक्ट्रिक लाइसेंस इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उनके पतियों के नाम अलग-अलग दर्शाए गए हैं। लाइसेंस का क्रमांक भी समान है, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि असली दस्तावेज कौन सा है।
इस गड़बड़ी का खुलासा तब हुआ जब तीन टेंडरों की जांच की गई, जिसमें से यूनिक इन्फ्रा नामक फर्म को अपात्र घोषित कर दिया गया, जबकि अमित कुमार और संतोष सूर्यवंशी की निविदाओं को पात्र पाया गया। दस्तावेजों की पड़ताल करने पर पता चला कि अमित कुमार और संतोष सूर्यवंशी दोनों ने ही अपने टेंडर में रेखा साहू नामक महिला का इलेक्ट्रिक लाइसेंस संलग्न किया है। एक लाइसेंस में उनके पति का नाम प्रकाश साहू, जबकि दूसरे में चेतन साहू उल्लेखित है। दोनों ही लाइसेंसों का नंबर भी एक ही है (36,32,65)।
बिना किसी गहन जांच के इस संदिग्ध निविदा को पात्र घोषित करने के कारण विभागीय अधिकारी संदेह के घेरे में आ गए हैं। सूत्रों का कहना है कि यदि दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जाए तो एक बड़ा खुलासा हो सकता है। यह भी जानकारी सामने आ रही है कि इसी संदिग्ध लाइसेंस का उपयोग कई अन्य टेंडरों में भी किया गया है। विभाग के टेंडर फार्म में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि यदि किसी भी प्रकार की गलत जानकारी पाई जाती है तो ठेकेदार को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाएगा।
यह अनियमितता सिर्फ अमरवाड़ा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि परासिया में भी इसी तरह गलत दस्तावेजों के आधार पर निविदाएं स्वीकृत की गई हैं। सूत्रों के अनुसार, जिस फर्म की निविदा निरस्त की गई है, उसके ठेकेदार भी इस खुलासे से अचंभित हैं। छात्रावासों में बिजली संबंधी कार्यों की महत्ता को देखते हुए, गलत व्यक्ति को ठेका दिए जाने से संभावित दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है।

इस मामले में विभाग के सहायक आयुक्त सत्येंद्र सिंह मरकाम ने जानकारी होने से इंकार किया है, जिससे अधिकारियों की लापरवाही और भी स्पष्ट होती है। वहीं, निविदा जांच समिति के पांच सदस्य – सत्येंद्र सिंह मरकाम, दीपक सरेयाम, माइकल बाबेरिया, राजेंद्र कुमार कोसले और सुनील श्रीवास्तव – भी संदेह के घेरे में हैं कि इतने अनुभवी होने के बावजूद इतनी बड़ी गलती कैसे हुई।
सूत्रों का कहना है कि इस टेंडर घोटाले में न केवल कोताही बरती गई है, बल्कि बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता की भी संभावना है। इस संबंध में तमाम दस्तावेज भोपाल स्थित उच्च अधिकारियों और ईओडब्ल्यू जैसी जांच एजेंसियों को भेजे जा रहे हैं। यदि पिछली निविदाओं की भी जांच की जाए तो और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, क्योंकि अनुसूचित बजट के आवंटन में मनमानी और नियमों के उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है।
फिलहाल, विभागीय अधिकारी इस मामले में लीपापोती करने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन ऑनलाइन प्रक्रिया के कारण उनके प्रयास सफल होते नहीं दिख रहे हैं। जिला प्रशासन और भोपाल के अधिकारी इस पूरे प्रकरण पर कड़ी नजर रखे हुए हैं और गलत जानकारी देने वाले ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट करने की तैयारी की जा रही है। वहीं, जांच समिति पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है।
रिपोर्ट– करन विश्वकर्मा– 9755432229